
जय मेरा बच्चपन का दोस्त, लेकिन रिश्ते में भाई। मेरे बड़े मामा जी के ’येष्ट पुत्र-जयप्रकाश जांगिड़। पढ़ाई में बहुत तेज, तभी तो आज एक राजकीय अध्यापक है। बचपन में साथ-साथ गरमियों की छुटि़यां मनाते थे, इसलिए बचपन की यादें तो बहुत हैं। गरमियों में जब खेत में जाते तो बिच रास्ते से ही घर आ जाते, क्योंकि डर लगता था, वो भी मारनी गायों से। नानी सुबह-सुबह बाजरे का खिचड़ दही के साथ खिलाकर हम दोनों को भेज देती थी, सोचती थी की खेत की रखवाले करके आयेंगें बेचारे। परंतु नानी मा¡ को क्या पता था कि ये बड़े डरपोक हैं कि खेत बीच रास्ते से ही आ जायेगें। आज नानी तो नहीं हैं लेकिन इस गलती पर शरमिंदगी महसूस होती है। आज नानी मा¡ होती तो माफी मा¡ग लेते हम दोनों। आज जय मेरे पास श्रीगंगानगर आया है, मिलकर याद ताजा हुई। दोनों एक बार बचपन की उन यादों में खो गये, उन सुकून भरे पलों में हम दोनों खोगये। बहुत सारी बातें की, दोनों बाजर गये खाया पीया, जय की पंसद की वस्तुओं की खरीददारी की। आज सुबह उसको गा¡व जाना था, रेलगाड़ी में छोडुने गया तो बहुत महसुस हुया कि काश वो बचपन के पल लोट आते, दोनों कई कई दिन साथ रहते खुब खेलते। लेकिन आज आज है।

4 comments:
mere dost aapka balog pada kar bete dino ki yad aa gai aakhen nam ho gayi. aapne itna lika mere liya kaphi h.many many thanks...
likhte rahna mere dost. is kalam ko rukne mat dene.
Bachpan aisa hi sundar hota hai Rajeshji. Nischit hi Nani maa naraj nahi huyi hogi balki unhe bhi hansi aa rahi hogi ki unake ladale kitane saral hai. Jaiji ke bare me jankar bahut khushi huyi. Kabhi milane ka mouka mila to khuskismati samjhoonga. Wish you and your family all my best wishes
Sushil Kumar Jangir - Doha (Qatar)
Thanks dear jai
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