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Thursday, July 17, 2008

Batan Ganwa re

रेतीले धौरों की भीनीं-भीनीं ख्ाुशबु!रेगीस्तान! नाम आते ही एक विरान, तपते रेतीले टीलों का दूर तक फैला विशाल जंगल का मंजर जहन में घूम जाता है। इंसान सोचने पर मजबूर होता है कि लोग कितनी विकट परिस्थियों में रहते हैं। ना पीने को मीठा पानी, ना यातायात के साधन, ना स्वास्थ्य सुविधायें, ना पढ़ाई के साधन आदि अनेक अभाव..। समय के साथ आज परिस्थितिया¡ बदल रही हैं। यहां का मुख्य कार्य है खेती जो सुबह से लेकर शाम तक होने वाला कार्य है। रेतिले इलाके में वर्षा की कमी मुख्य समस्या है, वर्षा होती है तो मानो विरान जंगल में फुटती हरी घास की कोंपलें जीवन का नया संचार करती हैं। तब तो हिरण, रोज, लोमड़ी, सभी प्राणी एक सकुन पाते हैं। यहां की खेती में बाजरी, मूंग, मोठ, गुंवार चना मुख्य हैं। बुआई मुख्यत: ऊ¡ट के हल जोतकर करते हैं। इस कार्य में हल चलाने वाले को कह जाता है- हाली। वो हाली भरी धूप में पसीने-पसीने होते हुये भी बिजाई करता रहता है, क्योंकि उसको पूरा विश्वास होता है कि उसकी मेहनत जरूर एक दिन रंग लायेगी। उसके खेत में लगेंगे बाजरी के सीटे, मूंग-मोठ,गंवार की फली, काकçड़ये-मतीरे तो इस रेगिस्तान की खासियत है। काकçड़ये को सुखाकर बनाते हैं, खेरला। खाने की बात करें तो खेत में जांटी की शीतल छांव में बैठकर खाने का मजा ही कुछ और है। रेतीले धोंरों के वासियों का मुख्य खान-पान बाजरे की रोटी, सांगरी का साग, फोक का बना रायता मस्त कर देने वाला होता है, साथ में हो लस्सी। बाजरे की खचडी़ जिसमें हो देशी घी, उसे घोट-घोट कर खायें तो बात ही निराली है। शाम को बाजरी की खीचड,़ कbी या फिर रायते के साथ, ओ हो मजा आ जाये। सुबह बासी बाजरी का खिचडी़ और दही ये भी बहुत अच्छा लगता है। आज सच पुछो तो खाना खाने के लिए समय ही नहीं है। आधुनिक युग में सभी सुविधायें मिलने लगी हैं, मिलता नहीं तो वो सुख जो पहले था। आज भागम-भाग की जिंदगी हर इंसान जीता है, जीवन एक दौड़ है, जिसमें सभी सबसे आगे जाना चाहते हैं, पिछे रह जाता है तो वो सुख, आनंद जिसकी एक तलाश थी।